ममता बनर्जी को बड़ा झटका! TMC सांसद काकोली घोष ने सभी संगठनात्मक पदों से दिया इस्तीफा

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है. अब पार्टी को बड़ा झटका लगा है. बारासात से TMC पार्टी की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने संगठन में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. पिछले कुछ समय से उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद की खबरें आ रही थीं, जिस पर अब इस इस्तीफे ने मुहर लगा दी है।

प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेजा पत्र
सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपना इस्तीफा तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेज दिया है. अपने पत्र में उन्होंने साफ किया है कि वह पार्टी संगठन के सभी पदों को छोड़ रही हैं. बता दें कि इससे पहले उन्होंने बारासात के जिलाध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह कोई बड़ा कदम उठा सकती हैं।

सांसद बनी रहेंगी काकोली घोष
हालांकि, काकोली घोष ने अभी तक तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है. वह लोकसभा में बारासात सीट से टीएमसी की सांसद बनी रहेंगी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका यह कदम पार्टी नेतृत्व को एक कड़ा संदेश है, जिससे यह साफ है कि वह संगठन के कामकाज के तरीके से खुश नहीं हैं।

पार्टी में बढ़ता असंतोष ममता के लिए चिंता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी के अंदर कई सांसद और विधायक नाराज चल रहे हैं. काकोली घोष जैसी सीनियर नेता का इस तरह पदों से किनारा करना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी चिंता का विषय बन सकता है. फिलहाल इस पूरे मामले पर टीएमसी आलाकमान की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

ममता बनर्जी के इस कदम से काकोली घोष आहत और नाराज चल रही हैं. काकोली घोष ने सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. काकोली घोष को टीएमसी के चीफ व्हिप से हटाए जाने के कुछ ही घंटों में केंद्र सरकार ने उनको वाई सिक्योरिटी दे दी थी. ऐसा तब था, जब अभिषेक बनर्जी से लेकर टीएमसी के तमाम नेताओं की सिक्योरिटी में कटौती की गई थी।

एक दिन पहले ही काकोली घोष टीएमसी के छह विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में भी शामिल हुई थीं. काकोली घोष टीएमसी की स्थापना के पहले से ममता बनर्जी की करीबी रही हैं।

I PAC को मैनर्स नहीं, बदतमीजी से बात करते थे
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी संगठन, चुनावी हार, आई-पैक की भूमिका और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि वह पिछले 40 वर्षों से पार्टी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब पार्टी सत्ता में नहीं थी और कार्यकर्ताओं को सड़कों पर प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन कुछ लोग बाहर से आकर पार्टी को नुकसान पहुंचा गए।

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उन्होंने पार्टी के कठिन समय में संघर्ष किया और मेहनत के दम पर संगठन को मजबूत बनाने में योगदान दिया। मैं अच्छे समय में पार्टी में नहीं आई थी। जब लोग सड़कों पर पीटे जाते थे, तब भी मैं पार्टी के साथ थी। हमने लंबे संघर्ष के बाद पार्टी को मजबूत किया और करीब 20 साल बाद सत्ता हासिल की।

व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी में आए कुछ लोग
काकोली घोष ने इशारों में उन नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी निशाना साधा, जो पार्टी के सत्ता में आने के बाद जुड़े। उनके अनुसार, ऐसे कई लोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति में आए। उन्होंने संगठन को मजबूत करने में कोई विशेष योगदान नहीं दिया। बंगालविधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार और चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी आई-पैक की भूमिका पर काकोली घोष दस्तीदार ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एजेंसी का काम करने का तरीका गलत था और उसके प्रतिनिधियों का व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति अपमानजनक था।

ममता बनर्जी के नौकर नहीं टीएमसी कार्यकर्ता
काकोली ने कहा कि हमारे कार्यकर्ता किसी के नौकर नहीं हैं। वे ममता बनर्जी और पार्टी के प्रति प्रेम और विश्वास के कारण काम करते हैं, लेकिन आई-पैक के लोगों ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया, जिससे कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी। उन्होंने यह भी कहा कि एजेंसी के कुछ सदस्य खुद को बहुत बड़ी सत्ता मानने लगे थे और स्थानीय नेताओं की राय को महत्व नहीं देते थे। उनके अनुसार, चुनाव प्रचार का संचालन करने वाली इस बाहरी एजेंसी के पास जमीनी राजनीति का पर्याप्त अनुभव नहीं था, जबकि पार्टी कार्यकर्ता लंबे समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं।

I-PAC में काम करने का बिल्कुल भी सलीका नहीं था। वे बहुत ही बदतमीज़ी से बात करते थे। हमारे ये कार्यकर्ता कोई नौकर नहीं हैं। हम इन्हें कोई तनख्वाह नहीं देते। ये तो ममता दीदी और पार्टी के प्रति अपने प्यार की वजह से काम करते हैं। वे लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते थे, और उनका घमंड इतना बढ़ गया था कि आखिरकार उन्होंने हमारे साथ भी बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। उन्हें ऐसा लगता था मानो वे प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा ऊंचे ओहदे पर बैठे हों। मुझे नहीं लगता कि I-PAC सीधे तौर पर उनके (ममता बनर्जी के) नियंत्रण में था, क्योंकि I-PAC एक अलग ही संस्था है।

‘गंदा धर्म’ बयान पर घिरीं ममता बनर्जी, TMC में भी उठने लगे विरोध के स्वर

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सिलीगुड़ी में ममता बनर्जी के खिलाफ एक वकील की शिकायत पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने पिछले साल कोलकाता में ईद के एक कार्यक्रम के दौरान हिंदू धर्म को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिससे करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर ममता बनर्जी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है। ममता के खिलाफ धारा 351 (1)- आपराधिक धमकी, धारा 352- शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर किया गया अपमान और धारा 353- विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी, नफरत या द्वेष की भावना को बढ़ावा देना के तहत मामला दर्ज किया गया है।

यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी द्वारा दर्ज कराई गई है। उन्होंने अपनी शिकायत में साल 2025 में कोलकाता के ऐतिहासिक रेड रोड पर आयोजित ईद-उल-फितर के कार्यक्रम में दिए गए ममता बनर्जी के भाषण का हवाला दिया है।

क्या कहा था ममता ने?
पिछले साल ईद के मंच से भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर हमला बोलते हुए ममता बनर्जी ने कथित तौर पर कहा था, “मैं उस गंदे धर्म को नहीं मानती जिसे इस ‘जुमला पार्टी’ ने जानबूझकर गढ़ा है।” आरोप है कि उन्होंने भाजपा द्वारा प्रचारित हिंदू धर्म के स्वरूप को गंदा धर्म कहकर संबोधित किया था।

भाजपा आईटी सेल के प्रमुख ने 31 मार्च 2025 को एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने लिखा था, ‘क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री (तत्कालीन) ममता बनर्जी के लिए सनातन धर्म एक गंदा धर्म है? उनके शासनकाल में कई हिंदू-विरोधी दंगे होने के बावजूद, उनमें हिंदुओं का मजाक उड़ाने और उनकी आस्था का अपमान करने की हिम्मत है। एक बार फिर उन्होंने मुसलमानों को हिंदुओं को निशाना बनाने की खुली छूट दे दी है। इस बार एक ऐसे धार्मिक मंच से, जो ईद मनाने के लिए था। उन पर शर्म आती है।’

वहीं, शिकायतकर्ता रिंकी चटर्जी का कहना है कि एक मुस्लिम धार्मिक सभा के मंच से सनातन धर्म को गंदा कहना पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इससे भारत सहित दुनिया भर के हिंदुओं का अपमान हुआ है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि कानून इस मामले में उचित और सख्त कार्रवाई करेगा। रिंकी चटर्जी ने अपनी शिकायत में कहा कि तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं और पूर्ववर्ती सरकार के मंत्रियों ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, जिसमें ममता बनर्जी का यह बयान सबसे गंभीर था। शिकायत में यह भी कहा गया है कि ममता बनर्जी ने साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी हिंदू समुदाय को परोक्ष रूप से धमकी दी थी।

TMC के भीतर से उठे विरोध के सुर
इस कानूनी कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही है। जब इस एफआईआर को लेकर टीएमसी की दार्जिलिंग इकाई के महासचिव और पेशे से वकील अत्री शर्मा से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने पार्टी प्रवक्ता के रूप में तो कुछ नहीं कहा लेकिन व्यक्तिगत तौर पर एक बेहद चौंकाने वाला बयान दिया। अत्री शर्मा ने स्वीकार किया कि जब तृणमूल सत्ता में थी तब भी पार्टी के भीतर कई लोग इस बयान के खिलाफ थे। उन्होंने कहा, “उस समय सत्ता की कमान संभालते हुए ममता बनर्जी के लिए इस तरह की टिप्पणी करना वास्तव में अनुचित था। यहां तक कि हममें से जो लोग उस समय से पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं, उन्होंने भी उन विशेष टिप्पणियों का कभी समर्थन नहीं किया। देश के हर नागरिक को शिकायत दर्ज कराने का नैतिक अधिकार है।”

कर्नाटक में ‘बिहार फॉर्मूला’ की चर्चा, सिद्धारमैया राज्यसभा तो बेटे को मंत्री पद?

बेंगलुरु 

कर्नाटक कांग्रेस में लंबे वक्त से चल रही सिद्धारमैया-डीके शिवकुमार की खींचतान अब एक संभावित फॉर्मूले की ओर बढ़ती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को राज्यसभा की सीट और राष्ट्रीय स्तर पर अहम भूमिका सौंपी जाएगी, जबकि उनके बेटे डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया को नई सरकार के कैबिनेट में मंत्री पद दिया जा सकता है। 

इससे डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सकता है. कांग्रेस का ये फॉर्मूला पार्टी में संतुलन और कर्नाटक सरकार में नेतृत्व परिवर्तन का साफ संकेत दे रहा है. साथ ही सूत्रों ने बताया कि शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे सकते हैं। 

सूत्रों ने बताया कि मंगलवार को दिल्ली में हुई कांग्रेस आलाकमान की मैराथन बैठक में ये फॉर्मूला तय किया गया है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने करीब सात घंटे चक कर्नाटक में मौजूदा राजनीतिक खींचतान को लेकर चर्चा की। 

हालांकि, कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर किसी भी नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा से इनकार किया है, लेकिन अंदरखाने चल रही राजनीतिक कवायद ने इस अटकल को और मजबूत कर दिया है कि सिद्धारमैया अब मुख्यमंत्री पद छोड़ सकते हैं। 

जल्द इस्तीफा दे सकतें हैं सिद्धारमैया
बैठक की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने बताया कि पार्टी नेतृत्व ने सिद्धारमैया को साफ कर दिया है कि कांग्रेस अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपना चाहती है, क्योंकि वह देश में कांग्रेस के सबसे बड़े-सम्मानित पिछड़ा वर्ग चेहरों में से एक हैं. पार्टी चाहती है कि साल 2029 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्र की राजनीति में आएं और राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी व प्रभावी सांगठनिक भूमिका निभाएं. सूत्रों ने ये भी बताया कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। 

KPCC के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देंगे शिवकुमार
सूत्रों ने ये भी बताया कि डीके शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफ देंगे. उनकी जगह सतीश जारकीहोली को पार्टी अध्यक्ष बनाया जा सकता है. सतीश अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंध रखते हैं। 

कांग्रेस आलाकमान द्वारा निकाले गए इस नए समझौते के अनुसार, वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया अब कर्नाटक की सक्रिय मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर केंद्र की राजनीति का रुख करेंगे, जहां पार्टी उन्हें राज्यसभा की सुरक्षित सीट देकर दिल्ली भेजेगी. सिद्धारमैया के केंद्र में जाने के बाद राज्य में डीके शिवकुमार के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सरकार बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा, जिससे दोनों गुटों के बीच का बड़ा गतिरोध हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। 

शिवकुमार को सम्राट की तरह कुर्सी 

सत्ता के ‘नेतृत्व परिवर्तन’ की लंबी चली यह रार अब आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंचती नजर आ रही है, डीके शिवकुमार का इंतजार अब खत्म होने की ओर है. कुर्सी की इस लड़ाई का अब पटाक्षेप होता दिख रहा है. कांग्रेस या कांग्रेस के नेताओं ने इसे लेकर आधिकारिक तौर पर अभी कुछ नहीं कहा है, लेकिन दिल्ली में सिद्धारमैया और शिवकुमार के साथ कांग्रेस आलाकमान की बैठक, इस बैठक के बाद बेंगलुरु में बढ़ी हलचल इसी तरफ इशारा करते हैं। 

चर्चा एक फॉर्मूले की भी है. इस फॉर्मूले के मुताबिक सीएम सिद्धारमैया को राज्यसभा के रास्ते दिल्ली लाए जाने की चर्चा है. सीएम सिद्धारमैया के बेटे डॉक्टर यतींद्र सिद्धारमैया को डीके शिवकुमार की कैबिनेट में मंत्री पद दिया जा सकता है. सीएम बनाए जाने के बाद शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी भी छोड़ सकते हैं और यह पद सिद्धारमैया के भरोसेमंद सतीश जारकीहोली को दिया जा सकता है। 

यह फॉर्मूला कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन के लिए निकाला गया है. बात कांग्रेस पार्टी की है. लेकिन यह है कुछ वैसा ही, जैसा हाल ही में बिहार में देखने को मिला. बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे. नीतीश कुमार राज्यसभा चले गए, मुख्यमंत्री और विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को नई सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया और सत्ता का सरदार सम्राट चौधरी बन गए। 

ठीक यही फॉर्मूला कांग्रेस अब कर्नाटक में अपनाती नजर आ रही है. सीएम सिद्धारमैया को नीतीश कुमार की तरह राज्यसभा भेजने के साथ ही पार्टी निशांत की तरह यतींद्र को मंत्री पद ऑफर कर रही है. बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के नीतीश कुमार की जगह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने थे. कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह कुर्सी शिवकुमार को मिलेगी। 

फर्क इतना है कि बिहार में मसला दो गठबंधन सहयोगियों के बीच का था और कर्नाटक में बात दो नेताओं की बीच की है. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक सिद्धारमैया ने अभी इस फॉर्मूले पर हां या ना नहीं कहा है. सीएम सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपनी सरकार के कैबिनेट मंत्रियों को ब्रेकफास्ट पर बुलाया है. इसे लेकर भी आधिकारिक तौर पर सरकार या पार्टी की ओर से कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन डीके शिवकुमार के शेड्यूल में इसका जिक्र है। 

TMC में बगावत के संकेत! ममता बनर्जी की पार्टी छोड़ सकते हैं 20 सांसद

कलकत्ता

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही बरकरार हैं। कहा जा रहा है कि एक दर्जन से ज्यादा विधायक खुलकर पार्टी की नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। वहीं, अटकलें ये भी हैं कि करीब 15 सांसद जल्द ही टीएमसी छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। इसके अलावा पार्टी नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव को लेकर उम्मीदवार खोजने में भी परेशानी का सामना करती नजर आ रही है।

विधायक हो रहे हैं नाराज
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 18 बड़े नेता ऐसे हैं, जो खुलकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इनमें सुखेंदु शेख रॉय, सांसद काकोली घोष दस्तीदार, देव अधिकारी, कल्याण बनर्जी, रचना बनर्जी, विधायक कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी, अरुणव सेन, संदीपन साहा, नियामत शेख, पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी, मनोज तिवारी, रविंद्रनाथ घोष, पूर्व विधायक अतीन घोष, खगेश्वर रॉय, सौरव चक्रवर्ती, रत्ना चटर्जी, तपन चटर्जी का नाम शामिल है।

20 सांसद बदल सकते हैं पाला
संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा है कि 12 टीएमसी सांसदों ने भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी कर ली है। इसके अलावा दल बदलने की तैयारी कर रहे सांसदों की लिस्ट में 5 से 6 नाम और हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि ये सांसद कौन होंगे और कब तक दल बदल की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 12 से ज्यादा सांसदों से चर्चा चल रही है और आंकड़ा 20 तक पहुंच सकता है।

100 से ज्यादा पार्षद दे चुके इस्तीफा
खबर है कि बीते कुछ दिनों में 100 से ज्यादा पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं। खास बात है कि ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब निकाय चुनाव में कुछ ही समय बाकी है। इतना ही नहीं पार्षद अब खुलकर टीएमसी नेतृत्व और सांसद अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं। ममता बनर्जी ने पार्षदों से एकजुट रहने की अपील की है।

नंदीग्राम में उम्मीदवार नहीं मिल रहा
ममता बनर्जी के सामने एक और बड़ी चुनौती नंदीग्राम से खड़ी होती दिख रही है। कहा जा रहा है कि टीएमसी को इस सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। कई बड़े नेता यहां से चुनाव लड़ने से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर उन्हें साल 2021 में शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। 2026 में भी अधिकारी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन भवानीपुर सीट से विधायक रहते हुए नंदीग्राम को छोड़ने का फैसला किया था।

तमिलनाडु में CM विजय का बड़ा गेमप्लान, अपने दम पर बहुमत हासिल करने की तैयारी?

चेन्नई

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने तमिलनाडु में गठबंधन की सरकार बनाई जरूर है, लेकिन उनका इरादा कुछ और ही लगता है. विजय जल्दी से जल्दी अपने बूते सरकार चलाना चाहते हैं. और यह गठबंधन साथियों, खास तौर पर कांग्रेस, के लिए काफी चिंता वाली बात हो सकती है। 

एक तरफ विजय लोक कल्याणकारी कदम उठा रहे हैं, और ऐन उसी वक्त विरोधी खेमे में बगैर बुलडोजर के ही तोड़-फोड़ की कार्रवाई चल रही होती है. विजय के सलाहकारों की टीम देश भर के नेताओं से सीखने और उस पर अमल करने की रणनीति पर काम कर रही है। 

मुख्यमंत्री ने सहकारी बैंकों से लिए गए किसानों के 50,000 रुपये तक के फसल लोन माफ कर दिए हैं. सरकारी ऐलान के अनुसार, जिन बड़े किसानों ने सहकारी बैंकों से फसल लोन लिया है, उन्हें भी 5 हजार रुपये की राहत दिए जाने की बात है। 

राज्यसभा में डेब्यू, और उपचुनावों की तैयारी
तमिलनाडु में 18 जून को राज्यसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव होना है. तमिलनाडु की मेलम विधानसभा सीट से चुन लिए जाने के बाद सीवी शनमुगम ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. मुख्यमंत्री विजय उसी सीट के जरिए टीवीके की राज्यसभा में एंट्री करना चाहते हैं। 

चर्चा है कि टीवीके में रिटायर्ड आईएएस अफसर यू सगायम को राज्यसभा भेजने पर विचार किया जा रहा है. तमिलनाडु में यू सगायम ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने कड़े रुख के लिए मशहूर रहे हैं. उनकी ईमानदारी के कई किस्से सुनाए जाते हैं। 

खास बात यह है कि यू सगायम ऐसे अफसर हैं जिनका 28 साल की सेवा में 25 बार ट्रांसफर हुआ. यू सगायम को राज्यसभा भेज कर मुख्यमंत्री थलपति विजय तमिलनाडु की जनता को संदेश देना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वो क्या करना चाहते हैं, और ऐसा करने से उनके पहले की डीएमके और एआईएडीएमके सरकारें अपने आप निशाने पर आ जाती हैं। 

राज्यसभा के साथ ही टीवीके नेतृत्व की नजर तमिलनाडु की चार विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव हैं. एक सीट तो मुख्यमंत्री विजय ने ही खाली की है, जबकि तीन सीटें टीवीके में शामिल होने वाले विधायकों के AIADMK छोड़ने से खाली हुई हैं। 

AIADMK विधायक के. मरगथम कुमारवेल, एस. जयकुमार और पी. सत्यभामा ने तमिलनाडु विधानसभा स्पीकर JCD प्रभाकर से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप दिया. मरगथम कुमारवेल मदुरंतकम सीट से, पी सत्यभामा धारापुरम सीट से और एस जयकुमार पेरुनदुरई सीट से AIADMK के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. धारापुरम और पेरुनदुरई को AIADMK का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, जबकि मदुरंतकम चेन्नई के पास महत्वपूर्ण सीट मानी जाती है। 

यह घटनाक्रम ऐसे वक्त सामने आया है, जब सीवी शनमुगम के नेतृत्व में टीवीके सरकार को समर्थन देने वाले 25 विधायकों में से कुछ के कैबिनेट में शामिल होने पर बातचीत चल रही थी. लेकिन, वाम दलों, वीसीके और टीवीके के ही कुछ नेताओं के दबाव में अचानक यह प्लान ड्रॉप कर दिया गया। 

इस्तीफा देने वाले विधायक अब टीवीके के चुनाव निशान सीटी पर फिर से मैदान में उतरेंगे. उपचुनाव जीतने के बाद वे टीवीके के विधायक बन जाएंगे, और उसके बाद किसी भी गठबंधन साथी को कोई आपत्ति नहीं होगी – खास बात यह है कि सिलसिला यहीं थमने वाला नहीं है। 

कांग्रेस और टीवीके का साथ कब तक
तीन विधायकों का इस्तीफा तो ट्रेलर लगता है. जननायगन के समानांतर विजय की सियासी पिक्चर अभी बाकी है. टीवीके के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि कम से कम 7 से 8 विधायक अभी आने वाले दिनों में ऐसे ही इस्तीफा दे सकते हैं। 

टीवीके के पास फिलहाल 107 विधायक हैं. टीवीके ने 108 सीटें जीती थीं, जिनमें मुख्यमंत्री विजय की जीती हुई दो सीटें शामिल थीं. विजय ने अपनी एक सीट खाली कर दी थी. अब अगर उपचुनावों में सभी सीटों पर जीत हासिल होती है, तो टीवीके के पास 111 सीटें हो जाएंगी. तमिलनाडु में बहुमत का आंकड़ा 118 है. टीवीके सरकार को कांग्रेस की पांच विधायकों का समर्थन हासिल है। 

अगर उपचुनाव घोषित होने से पहले और विधायक इस्तीफा देकर टीवीके में शामिल हो जाते हैं, तो टीवीके को सहयोगियों पर निर्भरता कम हो जाएगी. सबसे ज्यादा 5 सीटों वाली कांग्रेस से छुटकारा पाना आसान हो जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक, टीवीके के सीनियर नेताओं का मानना है कि विजय जैसे करिश्माई नेता के इर्द-गिर्द बनी पहली पीढ़ी की राजनीतिक पार्टी चुनाव के बाद बने सहयोगी दलों पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रह सकती। 

एक सीनियर टीवीके नेता का कहना है, अगर ये सीटें साथ में जाती हैं, तो बात बहुत मायने रखती है. जब लोगों को लगता है कि सरकार खुद को स्थिर कर रही है, तो जनता के बीच माहौल बदलने लगता है। 

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की रणनीति जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला से काफी हद तक मिलती जुलती लगती है. हालांकि, दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरण में थोड़ा फर्क भी है. उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. विजय ने कांग्रेस के साथ चुनाव बाद गठबंधन किया है। 

कांग्रेस ने चुनाव से पहले तो उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन कर लिया था, लेकिन सरकार में शामिल नहीं हुई. उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. धीरे धीरे गठबंधन रस्मअदायगी भर रह गया. केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में कांग्रेस के 6 विधायक हैं. कहने को तो कांग्रेस सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन पार्टी की वही स्थिति है जैसी तमिलनाडु की पिछली डीएमके सरकार में थी। 

ऐसा ही एक उदाहरण दिल्ली में मिलता है. 2013 में अरविंद केजरीवाल भी बहुमत के आंकड़े से पिछड़ गए थे. पहली बार सरकार बनाने के लिए केजरीवाल ने कांग्रेस का सपोर्ट लिया था, लेकिन अपने बूते सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को अगले विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ा, विजय तमिलनाडु में ये सब पहले ही कर लेना चाहते हैं। 

क्या टीवीके नेता थलपति विजय का ताजा एक्शन बीजेपी के ‘ऑपरेशन लोटस’ जैसा है?

देखा जाए तो तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए टीवीके के राजनीतिक सपोर्ट लेने की शुरुआत गठबंधन की कोशिश के रूप में हुई थी. जिसमें AIADMK के बागियों का भी समर्थन मिला था. लेकिन, अब रणनीतिक बदलाव साफ साफ नजर आने लगा है. अब जो कुछ हो रहा है, वह कुछ हद तक राजनीतिक अधिग्रहण जैसा माना जा सकता है. बीते वक्त में कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बीजेपी को ऐसे तौर तरीके अपनाते देखा जा चुका है, जिसे ‘ऑपरेशन लोटस’ के रूप में याद किया जाता है।

 रिपोर्ट के मुताबिक, सत्ताधारी टीवीके जिस तरीके से कदम बढ़ा रही है, तमिलनाडु की राजनीति के कई नेता निजी तौर पर इसे कहीं ज्यादा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट मान कर चल रहे हैं, और टीवीके का मकसद पूरी तरह साफ है – अब एक ही मिशन है, सहयोगी दलों पर निर्भरता कम करने के साथ ही 234 सदस्यों वाली विधानसभा में सीधे 118 के महत्वपूर्ण आंकड़े तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ना। 

‘लोटस’ नहीं, ऑपरेशन ‘एल’
टीवीके की रणनीति में बीजेपी की राजनीति की जो झलक देखने को मिल रही है, उसे तमिलनाडु की राजनीति में अब एक नया नाम भी मिल चुका है – ऑपरेशन एल

यह नाम बताया है AIADMK नेता एडप्पाडी के. पलानीस्वामी के करीब माने जाने वाले एक नेता ने. जब उनसे पूछा गया कि ‘एल’ का क्या मतलब है, तो उन्होंने लोटस नहीं बल्कि कई और नाम बता डाले. इंडियन एक्सप्रेस से हंसते हुए वो कहते हैं, लॉटरी, या लीमा या लीव… जो चाहो समझ लो। 

AIADMK नेता का यह कटाक्ष टीवीके में दबदबा रखने वाले नेताओं के इर्द-गिर्द घूमता है. एल से लॉटरी कहने का उनका आशय टीवीके के भीतर काफी प्रभावशाली माने जाने वाले अर्जुन से है, जो लॉटरी कारोबारी सैंटियागो मार्टिन के दामाद हैं. लीमा नाम AIADMK विधायक लीमा रोज मार्टिन की तरफ इशारा है, जो मार्टिन की पत्नी हैं. लीव का मतलब विधायकों के AIADMK छोड़ने से भी जोड़ा जा सकता है, और वैसे भी AIADMK का चुनाव निशान ‘टू लीव्स’ यानी दो पत्तियां हैं – और पार्टी के टूटने को दो में से एक पत्ती के अलग होने की तरफ इशारा है। 

 

 

TMC में बड़ी टूट के संकेत! BJP के ‘ग्रीन सिग्नल’ का इंतजार कर रहे 20 से ज्यादा सांसद

कलकत्ता

बंगाल में बदलाव हो गया. अब बदलाव के दायरे का विस्तार हो रहा है. बंगाल में 206 सीटों के साथ भाजपा ने सरकार बना ली. ममता बनर्जी की टीएमसी 80 पर ही अटक गई. ममता अब भी मानने को तैयार नहीं कि उनकी हार स्वाभाविक है. यह 15 साल से जनता के भीतर पनप रहे असंतोष और आक्रोश की स्वाभाविक परिणति है. पर, ममता टीएमसी की हार को भाजपा और चुनाव आयोग की साजिश मानती हैं. वे अपनी हार पर रोज ही विलाप के अंदाज में दोनों को खरी-खोटी सुनाती हैं. अब तो हालत यह हो गई है कि टीएमसी के उनके साथी भी भरोसेमंद नहीं रहे. नगर निकायों के पार्षद थोक में इस्तीफा दे रहे हैं. टीएमसी के ज्यादातर सांसद और विधायक भाजपा के संपर्क में हैं. पार्टी की बैठकों-कार्यक्रमों में उनकी गैरहाजिरी इसका संकेत है. ममता को भी अब लगने लगा है कि उनके लोग जान-बूझ कर दूरी बना रहे हैं. तभी तो उन्हें कहना पड़ रहा है कि जिन्हें जाना है, वे चले जाएं. बचे-खुचे लोगों से वे टीएमसी को पुनर्जीवित कर लेंगी। 

पार्षदों के थोक में इस्तीफे
विधानसभा चुनावों में हार के बाद नगरपालिकाओं में टीएमसी पार्षदों के सामूहिक इस्तीफे का सिलसिला शुरू हो गया है. आधा दर्जन से अधिक नगरपालिकाओं में थोक के भाव टीएमसी पार्षदों के इस्तीफे हुए हैं. यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. फालता सीट पर आए नतीजे के बाद डायमंड हार्बर में भी पार्षदों के इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है. पार्षदों के इस्तीफे की शुरुआत उत्तर 24 परगना जिले के भाटपाड़ा से हुई थी. कुल 35 में 30 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफे सौंप दिए. इसी तरह हालीशहर के 23 पार्षदों में 16 ने एक साथ इस्तीफा दे दिया. उत्तर बैरकपुर, गारुलिया और डायमंड हार्बर में इस्तीफों का सिलसिला जारी है. कई और नगरपालिकाओं और निगमों में भी टीएमसी पार्षदों ने इस्तीफे दिए हैं. कोलकाता नगर निगम में भी टीएमसी के पार्षद पाला बदलने को बेताब दिखते हैं.
ममता बनर्जी के खिलाफ बगावती तेवर देखने को मिले। 

कब होगा दल बदल!
रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल सांसदों की संख्या को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। दरअसल, चर्चाएं इस बात को लेकर हैं कि दल बदल कानून से बचने के लिए कितने सांसदों की जरूतर होगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि इसे लेकर मॉनसून सत्र तक स्थिति साफ हो सकती है। कहा यह भी जा रहा है कि दल बदल के कथित प्रयासों में लगे कई सांसद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी हैं।

विधायक बना रहे हैं दूरी
चुनाव में हार के बाद 20 मई को पहली बार टीएमसी ने प्रदर्शन किया था, जिसमें बड़ी संख्या में टीएमसी विधायक शामिल नहीं हुए थे। यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के एक दिन बाद सामने आया था, जिसमें कथित तौर पर जनता से जुड़ने के लिए सड़क पर उतरने की राजनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी।

हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही कार्यक्रम में पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं। यह ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी चुनावी हार के बाद खुद को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके।

एजेंसी वार्ता के अनुसार, फलता में भाजपा की जीत के बाद डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के आठ पार्षदों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए। डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के 16 पार्षद थे। इस शहरी स्थानीय निकाय में दूसरी किसी पार्टी का एक भी पार्षद नहीं था। आठ पार्षदों ने सोमवार को अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे सौंपे हैं।

बैठकों व कार्यक्रमों से दूरी
ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से अब तक जितनी बैठकें की हैं, उनमें पार्टी के सभी विधायक नहीं शामिल हुए. शामिल न होने की कोई वजह बताना भी विधायकों ने मुनासिब नहीं समझा. चूंकि बैठकें टीएमसी चीफ ममता ने बुलाई थीं, इसलिए सबकी उपस्थिति जरूरी थी. खासकर तब, जब पार्टी के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. टीएमसी के सांसद भी ममता से दूरी बनाने लगे हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद ममता की बुलाई पहली ही बैठक से 10-12 नवनिर्वाचित विधायक नदारद रहे. विरोध प्रदर्शनों में सभी विधायकों की भागीदारी ममता बनर्जी सुनिश्चित नहीं कर पाईं। 

अभिषेक के नेतृत्व पर प्रश्न
इतना ही नहीं, अब तो ममता बनर्जी और उनके भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर भी सांसद-विधायक खुल कर सवाल उठाने लगे हैं. टीएमसी के सामने 2021 के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है. कालीघाट में हुई समीक्षा बैठकों में कुणाल घोष, रितुव्रत बनर्जी जैसे वरिष्ठ विधायकों ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के फैसलों पर सीधे सवाल उठाए. विधायकों का मानना है कि बंद कमरों में रणनीति बनाने से पार्टी फिर से मजबूत नहीं होगी. इसके लिए कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना होगा. बागी नेताओं का आरोप है कि बंद कमरे में आलाकमान द्वारा लिए गए फैसले जबरदस्ती नेताओं पर थोपे गए, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं और पार्षदों ने पार्टी से दूरी बनाना शुरू कर दिया है। 

MP काकोली के तल्ख तेवर
टीएमसी के संकट को इससे भी समझा जा सकता है. ममता ने 4 बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार से लोकसभा में मुख्य सचेतक का पद छीन कर कल्याण बनर्जी को दे दिया. इससे काकोली की नाराज हुईं. ममता का यह फैसला उन्हें पार्टी के भीतर अपना अपमान लगा. भाजपा ने उनकी नाराजगी को भुना लिया. केंद्र सरकार ने काकोली को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की ‘Y’ श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा मुहैया कराई है. इंटेलिजेंस ब्यूरो की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर उन्हें यह सुरक्षा दी गई है. सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अब टीएमसी के लिए राजनीतिक रणनीति बनाने वाली आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया है. काकोली की नाराजगी सामान्य बात इसलिए नहीं है कि यह सांसदों में भगदड़ का संकेत हो सकता है. उनकी तरह और भी कई सांसद हैं, जो पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं। 

सांसद-विधायक साथ छोड़ेंगे?
टीएमसी के एक सांसद की बातों पर भरोसा करें तो आने वाले कुछ दिनों में ममता बनर्जी को जोर का झटका लगने वाला है. लोकसभा में टीएमसी के अभी 29 सांसद हैं. लोकसभा में सर्वाधक सांसदों वाली विपक्ष की यह दूसरी पार्टी है. पर, अब यह स्थिति बदलने वाली है. भाजपा से ग्रीन सिग्नल मिला तो झटके में 20-25 लोग पाला बदल सकते हैं. कल्याण बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और अन्य एक-दो सांसदों को छोड़ कर बाकी को साथ लेने के लिए भाजपा तैयार है. चर्चा है कि अगले ही महीने भाजपा इसे मूर्त रूप दे सकती है. लोकसभा में अभी भाजपा के 240 सांसद हैं. बहुमत का आंकड़ा 272 का है. अगर टीएमसी के सांसद टूट कर भाजपा के साथ जाते हैं तो भाजपा सांसदों की लोकसभा में संख्या बहमत के आंकड़े के करीब हो सकती है. अभी केंद्र में भाजपा के ही नेतृत्व में सरकार है, लेकिन अकेले बहुमत न रहने के कारण उसे एनडीए के साथी दलों के सहारे सरकार बनानी पड़ी है। 

नंदीग्राम में TMC की बढ़ी मुश्किलें, ममता बनर्जी को नहीं मिल रहा उम्मीदवार!

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। अब खबर है कि पार्टी को नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। फिलहाल, सीट पर उप चुनाव का भी ऐलान नहीं हुआ है। अटकलें हैं कि टीएमसी नेता यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के साथ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी, लेकिन अंत में उन्होंने यह सीट छोड़ने का फैसला किया। खास बात है कि अधिकारी 2021 में भी तत्कालीन सीएम ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हरा चुके हैं।

2 नेता कर चुके मना
पूर्वी मिदनापुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उप चुनाव की तारीख का ऐलान कभी भी हो सकता है। अब अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि यहां टीएमसी ने उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यहां से टीएमसी को उम्मीदवार खोजने में मुश्किल हो रही है। साथ ही दो नेताओं ने तो यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। 2026 विधानसभा चुनाव में भी अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है।

नंदीग्राम से लड़ने नेता मना क्यों कर रहे
अधिकारी के कभी करीबी रहे पवित्र कर भी नंदीग्राम से नहीं लड़ना चाहते। खास बात है कि शुभेंदु ने उन्हें ही इस सीट से हराया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, वह कहते हैं, ‘कुछ लोग मुझसे बात करने आए थे, लेकिन मैं दोबारा नंदीग्राम से नहीं लड़ सकता। इसका सवाल ही पैदा नहीं होता है।’ चुनाव से कुछ समय पहले ही कर भारतीय जनता पार्टी छोड़ टीएमसी में गए थे।

2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी के इलेक्शन एजेंट रहे शेख सूफियान भी यहां से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मैंने 2006 में नंदीग्राम का चुनाव लड़ा था। उसके बाद टीएमसी में से किसी ने भी मुझसे चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा। मुझे अब चुनावों में दिलचस्पी नहीं है। मैं मेरे परिवार की सलाह मानकर राजनीति से रिटायर हो रहा हूं।’

टीएमसी का क्या है प्लान
रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘उम्मीदवार का चुनाव ममता बनर्जी करेंगी और इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। चुनावों का ऐलान होने दीजिए।’

फलता जैसा लक्ष्य रखा
मुख्यमंत्री बनने के बाद नंदीग्राम के अपने पहले दौरे पर अधिकारी ने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि सीट खाली करने के बावजूद उनका अपने राजनीतिक गढ़ से जुड़ाव पूरी तरह मजबूत बना हुआ है। उन्होंने अभिनंदन रैली को संबोधित करते हुए अपने समर्थकों से पूछा कि क्या वे नंदीग्राम में भी फाल्टा जैसी जीत का अंतर दोहरा सकते हैं, जहां भाजपा ने एक लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की है।

RJD को बड़ा झटका, रितु जायसवाल ने थामा BJP का दामन; संजय सरावगी ने दिलाई सदस्यता

पटना
 आरजेडी की पूर्व महिला नेता रितु जायसवाल अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं. बीजेपी प्रदेश संजय सरावगी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई. इस मौके पर मंत्री दिलीप जायसवाल भी मौजूद रहे. बता दें कि जायसवाल ने BJP का दामन थामने की औपचारिक घोषणा 24 मई को की थी. आरजेडी छोड़कर रितु जयसवाल के साथ कई अन्य नेता भी बीजेपी में शामिल हुए। इनमें प्रोफेसर राजमणि, सीमा जायसवाल, माया गुप्ता, शकुंतला प्रजापति, संगीता यादव, सुलेखा खातून, पानो देवी, अनिल महतो और शिवशंकर शामिल हैं। 

बीजेपी में शामिल होने के बाद ऋतु जयसवाल ने कहा कि आज वह पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ पार्टी में शामिल हो रही हैं. उन्होंने कहा कि उनके पुराने वीडियो सामने लाकर उन्हें ट्रोल किया जा सकता है, लेकिन वह डरने वाली नहीं हैं.उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब उन्हें बागी कहा गया था। इसके बावजूद उन्होंने करीब 65 हजार वोट हासिल किए थे। 

रितु जायसवाल ने कहा कि बीजेपी राष्ट्रहित की राजनीति करती है और देश से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वे राष्ट्रहित और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करते हैं। 

RJD से क्यों बढ़ी दूरियां?
मुखिया दीदी’ के नाम से पहचान बनाने वाली रितु जायसवाल पहले आरजेडी की महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में परिहार सीट से चुनाव लड़ा था और बहुत कम अंतर से हार गई थीं. लेकिन बाद में आरजेडी ने उनका टिकट काट दिया था. पार्टी ने उनकी जगह दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिससे नाराज होकर रितु जायसवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया था. उन्हें 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और आरजेडी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर पहुंच गया था. इसके बाद आरजेडी ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। 

मुखिया के तौर पर बनाई पहचान
रितु जायसवाल का राजनीतिक सफर काफी खास माना जाता है. मुंबई से सीतामढ़ी आकर उन्होंने सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया के रूप में काम किया और अपने काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. पढ़ी-लिखी और सक्रिय महिला नेता के रूप में उनकी अच्छी छवि रही है। 

वैश्य समाज पर पकड़
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि
बीजेपी उन्हें अपने साथ जोड़कर वैश्य समाज और महिला वोटरों के बीच पकड़ मजबूत करना चाहती है. सीतामढ़ी, शिवहर और आसपास के इलाकों में युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अच्छी लोकप्रियता मानी जाती है. बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है। 

MP राज्यसभा चुनाव में BJP का ‘सवर्ण कार्ड’, भदौरिया और कांतदेव सबसे आगे

भोपाल 

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार बीजेपी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार ‘सवर्ण’ चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों के साथ कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट पर भी नजर रखे हुए है। पार्टी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को ‘गिफ्ट’ देना चाहती है। इसके लिए बीजेपी कांग्रेस से आए किसी नेता को चेहरा बना सकती है। पार्टी की नजर उन विधायकों पर भी है जो कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं।

पहली सीट का गणित

सामान्य वर्ग को मौका देने की वजह
मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 26 जून 2026 को समाप्त होगा। इनमें दो सीटें बीजेपी (डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन) और एक सीट कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) के पास है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले चुनावों में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलकर सामाजिक संतुलन साधा था।

इस बार समीकरण बदल रहे हैं। पार्टी अब ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से किसी कद्दावर चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है। इसी कड़ी में अरविंद भदौरिया और कांतदेव सिंह के नाम चर्चा में हैं। दोनों नेता आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं।

1. कांतदेव सिंह (प्रदेश उपाध्यक्ष): विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह की जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि बीजेपी किसी क्षत्रिय चेहरे को चुनती है तो वे सबसे प्रबल दावेदार हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। उज्जैन संभाग के प्रभारी रहने के साथ सिंगरौली निकाय चुनाव में भी उनकी अहम भूमिका रही है।

2. अरविंद भदौरिया: पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी इस रेस में बना हुआ है। संगठन और सरकार में काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी के काम आ सकता है। 2020 में मप्र में हुए सत्ता परिवर्तन में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे।

तत्कालीन कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 22 विधायकों को बैंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। विधायकों को अलग-अलग जगहों से बैंगलुरू ले जाने और वहां रुकवाने की जिम्मेदारी अरविंद भदौरिया के पास थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सरकार में भदौरिया को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। हालांकि, वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे।

एससी-एसटी वर्ग को एडस्ट किया जा सकता है
सवर्ण कार्ड की चर्चा के बीच बीजेपी अन्य वर्गों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही है।
एससी वर्ग: चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी को देखते हुए लाल सिंह आर्य का नाम चर्चा में है।

एसटी वर्ग: बेहतर प्रदर्शन के आधार पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिल सकता है। मालवा के आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में है।

जॉर्ज कुरियन: भरोसेमंद चेहरा फिर हो सकता है रिपीट

केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन को बीजेपी दोबारा राज्यसभा भेज सकती है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन उन वफादार नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जनसंघ के दौर से पार्टी का झंडा थामे रखा है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

तीसरी सीट के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए राज्यसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को समझना जरूरी है।
न गुप्त मतदान, न ही ईवीएम का इस्तेमाल

राज्यसभा चुनाव में न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल होता है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम के आगे एक से चार तक नंबर लिखा होता है। इसमें विधायकों को वरीयता के आधार पर उस पर चिह्न लगाना होता है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है।

यह संख्या कुल विधायक और राज्यसभा सीटों के आधार पर तय होती है। इसमें एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है।
कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है

राज्यसभा चुनाव में एक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है। फिर कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। अंत में जो संख्या निकलती है, वही जीत के लिए जरूरी होती है।

कांग्रेस के पास संख्या बल, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस के खाते में मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी इस सीट पर भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। कांग्रेस को आशंका है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं या मतदान से अनुपस्थित रह सकते हैं। इससे तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।

    दतिया से विधायक राजेंद्र भारती का चुनाव रद्द होने के बाद यह सीट फिलहाल खाली है।
    विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता समाप्त करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। हालांकि, वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।

    बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे हाल के दिनों में बीजेपी के कार्यक्रमों में नजर आई हैं। हालांकि, उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। कांग्रेस उनसे संपर्क बनाए हुए है, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर असमंजस है।

    अटेर से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे बजट सत्र में उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इसके पीछे पारिवारिक कारण बताए थे।

    टिमरनी से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह हाल ही में आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।

    सुसनेर से कांग्रेस विधायक भैंरो सिंह परिहार ने हाल ही में कहा था कि उनका संघ से वैचारिक जुड़ाव है।

    कांग्रेस को आशंका है कि बीजेपी हाल ही में पार्टी छोड़कर आए किसी नेता को उम्मीदवार बना सकती है। संभावित नामों में सुरेश पचौरी की चर्चा सबसे ज्यादा है। माना जाता है कि उनके दोनों दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं।

कमलनाथ हो सकते हैं उम्मीदवार
कांग्रेस आलाकमान विधायकों को एकजुट रखने के लिए कमलनाथ को मैदान में उतार सकती है। केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि इससे सीट सुरक्षित रहेगी। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी, पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के नाम भी चर्चा में हैं।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया है कि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने के लिए पुराने मामलों को हथियार बना रही है।

एक्सपर्ट बोले- कांग्रेस में एकजुटता मुश्किल
वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह के मुताबिक, तीसरी सीट को लेकर बीजेपी से ज्यादा चुनौती कांग्रेस के सामने है। कमलनाथ का नाम इसलिए सामने आया है ताकि विधायकों को एकजुट किया जा सके, लेकिन यह मुश्किल काम है। कांग्रेस में गुटबाजी का रोग 50 साल पुराना है।

2018 के चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने पंगत में संगत कार्यक्रम चलाया था। उसे छोड़ दें तो कांग्रेस में हर समय गुटबाजी हावी रही है। दूसरी तरफ बीजेपी सेंधमारी में उस्ताद मानी जाती है। बीजेपी ऐसे मौके तलाशती रहती है।

भवानीपुर से ज्यादा TMC को क्यों डरा रहा फलता का नतीजा? बंगाल की राजनीति में नए संकेत

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला। 

ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस ‘ग्रासरूट मशीनरी’ यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के ‘नंबर दो’ और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र ‘डायमंड हार्बर’ का एक मुख्य हिस्सा है। 

इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है। 

अभिषेक का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ ध्वस्त
यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। 

शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात ‘डायमंड हार्बर’ मॉडल अब तृणमूल के ‘हार-बार’ मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है। 

अंतर्कलह का अंत नहीं
इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे ‘पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार’ के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है। 

ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना
चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है। 

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न कर पाना कार्यकर्ताओं के मनोबल के पूरी तरह टूटने का सबूत है. हालांकि अभिषेक बनर्जी ने हार के बाद इलेक्शन कमीशन पर गड़बड़ी का आरोप लगाया और दावा किया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं को परेशान किया गया. कार्यकर्ताओं के बीच संदेश यह गया है कि अगर लीडरशिप उनके अपने ही सबसे सुरक्षित गढ़ में उनकी सुरक्षा और राजनैतिक अस्तित्व पक्का नहीं कर सकती, तो आने वाले बड़े चुनावों में वे पूरी तरह असुरक्षित हैं. जब एक मजबूत किले में पार्टी का वोट शेयर 89% से गिरकर सिर्फ 3.7% हो जाता है, तो कार्यकर्ता इसे सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व का सरेंडर मानते हैं. इससे दक्षिण 24 परगना सहित दूसरे जिलों में भी नीचे के स्तर के कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता या पार्टी छोड़ने (दलबदल) की प्रवृत्ति बढ़ने की प्रबल आशंका है। 

लेफ्ट और कांग्रेस का उभार
फलता के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की विपक्षी राजनीति के समीकरण को भी पूरी तरह से बदल दिया है. इस उपचुनाव में माकपा (सीपीआई-एम) का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस का तीसरे स्थान पर रहना टीएमसी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी का साफ संकेत है. टीएमसी की सत्ता मुस्लिम और ग्रामीण वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण पर टिकी रही. लेकिन, लेफ्ट और कांग्रेस का उभार यह दिखाता है कि सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) मत अब केवल भाजपा तक सीमित नहीं हैं. बल्कि वे एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प की ओर भी मुड़ रहे हैं. यह टीएमसी के लिए एक बड़ा रणनीतिक खतरा है. दूसरी ओर, भाजपा के लिए फलता की यह जीत एक संजीवनी बूटी की तरह है, जिसने उनके कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस जीत को ‘डराने-धमकाने पर लोकतंत्र की विजय’ बताया है, जो यह दिखाता है कि भाजपा इस बेहद लोकल नतीजे का उपयोग राज्य स्तर पर टीएमसी के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में करने जा रही है। 

आखिर में, भवानीपुर की हार या जीत केवल ममता बनर्जी के प्रभाव तक सीमित होती है, लेकिन फलता की हार टीएमसी की जमीनी मशीनरी की ‘फेलियर’ यानी ऑर्गेनाइजेशन की नाकामी का सबूत बन जाती है. यह नतीजा साबित करता है कि पार्टी का अंदरुनी सिस्टम भीतर से कमजोर हो रहा है और बीजेपी के कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के सामने टिकने में नाकाम है. यह हार एक बड़ी चेतावनी है कि राजनीति में सिर्फ आक्रामक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी वफादारी और संगठन में तालमेल ही पार्टी की साख को बचाए रखता है। 

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