PM मोदी के नॉर्वे दौरे के बाद ‘सपेरे’ वाले कार्टून पर विवाद, सोशल मीडिया पर भड़के लोग

नई दिल्ली
नॉर्वे के एक बड़े अखबार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कार्टून बनाया है जिस पर अब विवाद शुरू हो गया. इस कार्टून में पीएम मोदी को सपेरे की तरह दिखाया गया था. उनके हाथ में सांप जैसी दिखने वाली एक पेट्रोल पाइप भी दिखाई गई. कार्टून के साथ छपे लेख का शीर्षक था, “A clever and slightly annoying man” यानी “एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी। 

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस कार्टून को नस्लवादी बताया. लोगों का कहना है कि पश्चिमी मीडिया अब भी भारत को “सपेरों का देश” वाली पुरानी सोच से देखता है. कई यूजर्स ने लिखा कि यह भारत की गलत और पुरानी छवि दिखाने की कोशिश है। 
एक यूजर ने एक्स पर लिखा, “यह कार्टून रेसिस्ट लगता है. पीएम मोदी खुद कई बार कह चुके हैं कि पहले दुनिया भारत को सपेरों का देश मानती थी, लेकिन अब वही सोच फिर दिखाई जा रही है.” कुछ लोगों ने इसे “औपनिवेशिक मानसिकता” भी बताया। 

विवाद तब और बढ़ गया जब नॉर्वे की पत्रकार हेले लाइंग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछा कि पीएम मोदी मीडिया से सवाल क्यों नहीं लेते. उन्होंने भारत में प्रेस फ्रीडम और मानवाधिकारों का मुद्दा भी उठाया. हालांकि पीएम मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस गाहर बिना जवाब दिए वहां से चले गए. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। 

इसके बाद भारत की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई. भारतीय राजनयिक सिबि जॉर्ज ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मीडिया को समझे बिना कुछ विदेशी संस्थाएं अधूरी जानकारी के आधार पर राय बना लेती हैं. उन्होंने कहा कि सिर्फ दिल्ली में ही 200 से ज्यादा न्यूज चैनल हैं और भारत जैसे बड़े देश को समझना आसान नहीं है। 

इससे पहले भी कई विदेशी मीडिया संस्थानों पर भारत को पुराने “स्नेक चार्मर” वाले स्टीरियोटाइप में दिखाने के आरोप लग चुके हैं. पीएम मोदी ने 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में कहा था कि दुनिया कभी भारत को “स्नेक चार्मर्स” यानी “सपेरों का देश” कहती थी, लेकिन आज भारत टेक्नोलॉजी और आईटी की ताकत बन चुका है। 

इटली में दिखी ‘मेलोडी’ की शानदार केमिस्ट्री, PM मोदी और मेलोनी ने साथ किया डिनर, फिर पहुंचे कोलोसियम

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पांच देशों के अहम कूटनीतिक दौरे के आखिरी पड़ाव पर मंगलवार को इटली की राजधानी रोम पहुंचे। रोम पहुंचने पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने बेहद खास अंदाज में उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं ने डिनर के बाद रोम के ऐतिहासिक ‘कोलोसियम’ का एक साथ दौरा किया है। इसके बाद, सोशल मीडिया पर एक बार फिर ‘मेलोडी’ (Meloni+Modi = Melodi) ट्रेंड कर रहा है।

तस्वीरों में ‘मेलोडी’ का खास अंदाज
पीएम मोदी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इन तस्वीरों को शेयर किया है। इन खास तस्वीरों में भारत-इटली की मजबूत होती दोस्ती और दोनों नेताओं के बीच की सहजता साफ देखी जा सकती है। पहली दो तस्वीरों में पीएम मोदी और जॉर्जिया मेलोनी एक बालकनी से रोम शहर के खूबसूरत नजारों को निहारते और गहरी बातचीत करते नजर आ रहे हैं। इस दौरान पीएम मोदी अपने चिर-परिचित नीले रंग के लिबास में हैं, जबकि मेलोनी पीच रंग के खूबसूरत और सौम्य परिधान में हैं।

एक तस्वीर में दोनों नेता कार की पिछली सीट पर बैठे हैं और कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे हैं। यह तस्वीर दोनों के बीच की बेहतरीन व्यक्तिगत बॉन्डिंग को दर्शाती है।

कोलोसियम का ऐतिहासिक नजारा: एक अन्य तस्वीर रात के समय की है, जहां दोनों नेता रोम की सबसे भव्य और प्राचीन इमारत ‘कोलोसियम’ के सामने खड़े होकर पोज दे रहे हैं।

पीएम मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, “रोम में उतरने के बाद, मुझे प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ रात्रिभोज पर मिलने का अवसर मिला, जिसके बाद मैंने मशहूर कोलोसियम का दौरा किया। हमने कई विषयों पर अपने विचार साझा किए। आज होने वाली हमारी बातचीत का मुझे बेसब्री से इंतजार है, जिसमें हम भारत-इटली की दोस्ती को और मजबूत बनाने के विषय पर अपनी चर्चा जारी रखेंगे।”

मेलोनी ने क्या कहा?
जॉर्जिया मेलोनी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोम पहुंचने पर उनका स्वागत किया। उन्होंने एक्स पर पीएम मोदी के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “वेलकम टू रोम, माय फ्रेंड!”

पहले भी वायरल हुईं मोदी-मेलोनी की तस्वीरें
यह पहला मौका नहीं है जब पीएम मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरी हों। इससे पहले साल 2023 में दुबई में हुए COP28 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी की ‘Good friends at COP28’ वाली सेल्फी काफी वायरल हुई थी।

वहीं, साल 2024 में इटली के अपुलिया में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान ‘मेलोडी टीम की तरफ से हैलो’ वीडियो ने भी दुनियाभर में चर्चा बटोरी थी।

दोनों नेताओं की यह आठवीं मुलाकात
विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, साल 2023 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जॉर्जिया मेलोनी के बीच यह आठवीं मुलाकात है। मार्च 2023 में मेलोनी की भारत यात्रा और जी-20 शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी ने दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी थी।

 

पीएम मोदी और मेलोनी का संदेश
इन पलों को शेयर करते हुए पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “रोम में उतरने के बाद, प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ डिनर पर मुलाकात का अवसर मिला, जिसके बाद ऐतिहासिक कोलोसियम का दौरा किया। हमने कई विषयों पर अपने दृष्टिकोण साझा किए। आज होने वाली हमारी वार्ता को लेकर उत्सुक हूं, जहां हम भारत-इटली की दोस्ती को और मजबूत करने के तरीकों पर अपनी चर्चा जारी रखेंगे।

वहीं, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने भी पीएम मोदी के साथ की तस्वीर साझा करते हुए गर्मजोशी से लिखा- रोम में आपका स्वागत है, मेरे दोस्त! इस मुलाकात का एक वीडियो भी सामने आया है जहां पीएम मेलोनी पीएम मोदी को रोम शहर के बारे में बता रही हैं।

आज की द्विपक्षीय वार्ता का मुख्य एजेंडा
यह यात्रा केवल इन शानदार तस्वीरों तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को नए मुकाम पर ले जाने का एक बड़ा अवसर है। ताज़ा जानकारियों के अनुसार, आज होने वाली आधिकारिक मुलाकातों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

रणनीतिक साझेदारी (2025-2029): दोनों देश ‘जॉइंट स्ट्रैटेजिक एक्शन प्लान 2025-2029’ की समीक्षा करेंगे। इसके तहत व्यापार, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाया जाएगा। (आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 16.77 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है)।

IMEC पर जोर: इस द्विपक्षीय वार्ता में ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) को लेकर विशेष चर्चा होने की उम्मीद है।

FAO मुख्यालय का दौरा: पीएम मोदी संयुक्त राष्ट्र के ‘खाद्य और कृषि संगठन’ (FAO) के मुख्यालय का भी दौरा करेंगे, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा और बहुपक्षवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

राष्ट्रपति से मुलाकात: पीएम मोदी इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मटारेला से भी मुलाकात करेंगे।

प्रवासी भारतीयों द्वारा भव्य स्वागत
रोम पहुंचने पर पीएम मोदी का भारतीय समुदाय ने बेहद शानदार स्वागत किया। इस दौरान इतालवी कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत (राग हंसध्वनि) और कथक नृत्य प्रस्तुत किया। पीएम मोदी ने बच्चों को ऑटोग्राफ दिए, वाराणसी के घाटों की एक पेंटिंग देखी और भारतीय मूल के लोगों से खास बातचीत की। इसके अलावा, उन्होंने ‘सनातन धर्म संघ’ की इटली में आधिकारिक मान्यता को लेकर आध्यात्मिक गुरुओं से भी मुलाकात की।

यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे के सफल दौरे के बाद, इटली में पीएम मोदी का यह स्वागत भारत की मजबूत होती वैश्विक पकड़ और इटली के साथ गहरी होती साझेदारी का एक स्पष्ट संकेत है। इन तस्वीरों ने कूटनीति के साथ-साथ दो वैश्विक नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती को भी बखूबी बयां किया है।

डिनर से कोलोसियम तक दिखी मोदी-मेलोनी की बॉन्डिंग, 4 साल में 7 मुलाकातों से बदले भारत-इटली रिश्ते

 नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को इटली पहुंचे। रोम पहुंचने के बाद उन्हें PM जॉर्जिया मेलोनी से मुलाकात की। PM मोदी ने X पर पोस्ट कर बताया कि दोनों नेताओं ने साथ में डिनर भी किया। इस दौरान कई अहम मुद्दों पर बातचीत की। इसके बाद मोदी और मेलोनी ने रोम के ऐतिहासिक कोलोसियम का दौरा भी किया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया पर मोदी के साथ तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ‘वेलकम टु रोम, माय फ्रेंड।’

PM मोदी ने कहा कि आज होने वाली औपचारिक बातचीत में भारत-इटली दोस्ती को और मजबूत करने पर चर्चा जारी रहेगी। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, निवेश, एडवांस टेक्नोलॉजी और वैश्विक मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मोदी इटली में कई अहम कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान वे इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मातारेला से भी मुलाकात करेंगे।

अपनी पांच देशों की यात्रा के आखिरी पड़ाव पर मंगलवार को वह रोम पहुंचे, जहां इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. मेलोनी ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “Welcome my friend .”

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी और इटली पीएम मेलोनी की मुलाकातें औपचारिक कूटनीतिक मुलाकातों से कहीं ज्यादा अहमीयत रखता है. पिछले कुछ वर्षों में दोनों नेताओं ने भारत-इटली संबंधों को एक नई दिशा दी है. कभी सीमित व्यापारिक रिश्तों तक सिमटे दोनों देशों के संबंध अब रक्षा, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, AI और ग्लोबल सप्लाई चेन जैसे बड़े रणनीतिक मुद्दों तक पहुंच चुके हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी रोम पहुंचते ही अपना एजेंडा भी बताया. उन्होंने एक एक्स पोस्ट में बताया, “इस दौरे में भारत और इटली के बीच सहयोग को कैसे मजबूत किया जाए, इस पर फोकस किया जाएगा, जिसमें इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) पर खास ध्यान दिया जाएगा। 

मोदी-मेलोनी की पहली मुलाकात बाली में
इस नई साझेदारी की शुरुआत नवंबर 2022 में इंडोनेशिया के बाली में हुए G20 शिखर सम्मेलन से मानी जाती है. उस वक्त मेलोनी हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री बनी थीं. दोनों नेताओं की पहली मुलाकात में यह साफ हो गया था कि भारत और इटली नए दौर की शुरुआत करना चाहते हैं. इसी बैठक में ग्रीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और इटैलियन मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की भारत में भागीदारी बढ़ाने पर सहमति बनी। 

भारत-इटली में स्ट्रेटेजिक पार्टनर्शिप
इसके बाद मार्च 2023 में मेलोनी भारत आईं और रायसीना डायलॉग में चीफ गेस्ट बनीं. यही वह मोड़ था जहां दोनों देशों के रिश्तों को आधिकारिक तौर पर “स्ट्रेटेजिक पार्टनर्शिप” का दर्जा मिला. इस दौरान रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इसके तहत दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यास, सिक्योर इंटेलिजेंस शेयरिंग और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. इटली की बड़ी रक्षा कंपनियों को भारत में सैन्य उपकरणों के को-प्रोडक्शन का रास्ता भी खुला। 

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर का हिस्सा इटली
सितंबर 2023 में नई दिल्ली में हुए G20 सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के रिश्ते एक और स्तर ऊपर पहुंच गए. इटली भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर यानी IMEC का हिस्सा बना. इस कॉरिडोर का मकसद भारत को यूरोप से जोड़ने वाला नया व्यापारिक और समुद्री नेटवर्क तैयार करना है. इसी दौरान माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट भी फाइनल हुआ, जिससे भारतीय छात्रों, रिसर्चर्स और स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए इटली में अवसर बढ़े। 

AI, स्पेस टेक्नोलॉजी, क्रिटिकल मिनरल्स पर करार
जून 2024 में इटली में आयोजित G7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की फिर मुलाकात हुई. यहां बातचीत का फोकस भविष्य की टेक्नोलॉजी पर रहा. दोनों देशों ने AI, स्पेस टेक्नोलॉजी, क्रिटिकल मिनरल्स, टेलीकॉम और क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन को लेकर सहयोग बढ़ाने का फैसला किया. साथ ही इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी राइट्स यानी पेटेंट और डिजाइन से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए। 

जी-20 में मेलोनी-मोदी की मुलाकात
इसके बाद नवंबर 2024 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में हुए G20 सम्मेलन में दोनों देशों ने 2025-2029 के लिए फाइव ईयर जॉइंट स्ट्रैटेजिक एक्शन प्लान लॉन्च किया. यह अब तक का सबसे बड़ा रोडमैप माना गया, जिसमें रक्षा, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, शिक्षा, व्यापार और वैश्विक सहयोग समेत 10 बड़े सेक्टर शामिल किए गए। 

नवंबर 2025 में साउथ अफ्रीका के जोहोन्सबर्ग में हुए G20 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की मुलाकात में आतंकवाद के खिलाफ एक बेहद अहम समझौता हुआ. दोनों देशों ने “इंडिया-इटली जॉइंट इनीशियेटिव टू काउंटर फाइनेंसिंग ऑफ टेररिज्म” लॉन्च किया, जिसका मकसद आतंकवादी संगठनों की फंडिंग पर लगाम लगाना था। 

दिल्ली में हुए हाई-प्रोफाइल आतंकी हमले के बाद मेलोनी ने भारत के साथ खुलकर एकजुटता दिखाई थी. इस पहल के तहत दोनों देशों ने आतंकियों को मिलने वाली अवैध फंडिंग और क्रॉस-बॉर्डर वित्तीय नेटवर्क को रोकने, संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर निगरानी बढ़ाने और एफएटीएफ और ग्लोबल काउंटरटेररिज्म फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपसी तालमेल मजबूत करने पर सहमति जताई। 

“इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर” पर करार
अब मई 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की यह रोम यात्रा दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा करने वाली मानी जा रही है. इस दौरान “इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर” की अवधारणा को औपचारिक रूप दिया गया है. इसका मकसद हिंद महासागर से लेकर यूरोप तक समुद्री व्यापार और रणनीतिक कनेक्टिविटी को मजबूत करना है. साथ ही AI को लेकर भी बड़ा समझौता हुआ है, जिसमें इटली के “एल्गोर-एथिक्स” मॉडल और भारत की “ह्युमन सेंट्रिक एआई” सोच को साथ लाने की कोशिश की गई है। 

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और इटली की यह बढ़ती नजदीकी सिर्फ दो देशों के रिश्तों की कहानी नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत भी है. एक तरफ भारत यूरोप में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है, वहीं इटली एशिया में भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार के रूप में देखता है। 

चारधाम यात्रा में 30 दिन में 55 मौतें, क्या हाई अल्टीट्यूड बन रहा है सबसे बड़ा खतरा?

देहरादून 

उत्तराखंड में इस बार चारधाम यात्रा 19 अप्रैल को शुरू हुई थी. यानि इस यात्रा को 30 दिन पूूरे हो चुके हैं. इस दौरान आधिकारिक तौर पर यात्रा में शामिल 55 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. ज़्यादातर मौतों की मुख्य वजह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, विशेषकर दिल की बीमारियां और ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां। 

इसमें 30 लोगों की मृत्यु केदारनाथ यात्रा के रास्ते में हुई तो 10 लोगों की मौत बदरीनाथ यात्रा के दौरान हुई तो यमनोत्री और गंगोत्री धाम के रास्ते में 8 और 7 मौतों का आंकड़ा बताया जा रहा है। 

उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार चार धाम यात्रा में मौतों में 70–75% तक मामले खराब स्वास्थ्य यानि प्री‑एक्सिस्टिंग हार्ट डिज़ीज, हाई ब्लडप्रेसर, डायबिटीज, पल्मोनरी एडिमा आदि के कारण होते हैं. कई वृद्ध यात्री या फिटनेस कम वाले लोग ऊंचाई, थकान और तनाव के कारण अचानक हार्ट अटैक, स्ट्रोक या फेफड़ों में सूजन से मर जाते हैं। 

आमतौर पर लोग यहां के चार धामों की यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करते हैं. इसके लिए रजिस्ट्रेशन कराना होता है. चूंकि ये यात्रा हाई अल्टीट्यूड पर ही ज्यादा होती है, लिहाजा लोगों को हृदय संबंधी दिक्कतों से भी जूझना होता है. सलाह दी जाती है कि हृदय संबंधी दिक्कतों वाले इन यात्राओं से बचें. आगे ये जानेंगे कि आखिर ऊंचाई वाली जगहें क्यों दिल संबंधी बीमारियों वालों के लिए जानलेवा भी बन जाती हैं। 

उत्तराखंड के चारों धाम ऊंचाई वाली जगहों पर ही हैं. सभी पहाड़ों की ऊंचाई पर हैं, उनमें मौसम भी ठंडा और बर्फीला रहता है, चाहे यमुनोत्री हो या फिर बद्रीनाथ. वहां गर्मी के मौसम में भी इर्द गिर्द के पहाड़ों पर बर्फ ढंकी नजर आती है. लेकिन ऊंचाई वाली जगहें कैसे हृदय स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। 

अधिक ऊंचाई पर रहना अगर उन व्यक्तियों के लिए फायदेमंद होता है, जिनका हृदय स्वास्थ्य अच्छा होता है. तो उन लोगों के लिए खतरनाक जो मौजूदा तौर पर हृदय जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हों. बहुत से श्रद्धालु बिना पहले से डॉक्टरी जांच, फिटनेस टेस्ट या ऊंचाई के अनुकूलन के बिना सीधे चार धाम के लिए निकल पड़ते हैं। 

हाई अल्टीट्यूड यानि उच्च ऊंचाई किसे माना जाता है?
– समुद्र तल से 6,560 फीट से नीचे का कोई भी स्थान कम ऊंचाई वाला माना जाता है. इससे ऊपर की यात्रा मध्यम ऊंचाई और उच्च ऊंचाई वाली मानी जाती है. समुद्र तल से 6,560 से 9,840 फीट के बीच वाले स्थानों को मध्यम ऊंचाई वाला माना जाता है. समुद्र तल से 9,840 फीट से ऊपर की जगहें उच्च ऊंचाई वाली होती हैं. ये वो जगहें हैं जहां आपका शरीर ऊंचाई से संबंधित महत्वपूर्ण प्रभावों का अनुभव करने लगता है। 

भारत में हाई अल्टीट्यूड एरिया के पैरामीटर्स क्या हैं?

– भारतीय सेना उच्च ऊंचाई (एचए) क्षेत्रों को 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर के क्षेत्रों के रूप में परिभाषित करती है। इन्हें ऊंचाई के आधार पर तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है:

स्टेज I: 9,000–12,000 फीट (2,750–3,657 मीटर)
चरण II: 12,000-15,000 फीट (3,657-4,572 मीटर)
चरण III: 15,000 फीट से ऊपर (4,572 मीटर)

चार धाम की यात्रा किन ऊंचाइयों से गुजरती है?
– छोटा चार धाम के दर्शन के लिए 4000 मीटर से भी ज्‍यादा ऊंचाई तक की चढ़ाई करनी होती है. इसमें कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें होती हैं तो कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें. इसलिए ये यात्रा मुश्किल मानी जाती है। 

चार धाम यात्रा गढ़वाल हिमालय में ऊंचाई पर होती है, इसलिए इसे उच्च ऊंचाई वाली यात्रा कहा जाता है. चार धाम यात्रा के चार तीर्थस्थल इन ऊंचाइयों पर हैं. भारतीय सेना के हाई अल्टीट्यूड वाले पैरामीटर्स के हिसाब से भी ये सारी जगहें हाई अल्टीट्यूड एरिया हैं। 

यमुनोत्री: 3,291 मीटर
गंगोत्री: 3,415 मीटर
केदारनाथ: 3,553 मीटर
बद्रीनाथ: 3,300 मीटर
केदारनाथ: 11,700 फीट
गंगोत्री: 10,200 फीट

हाई अल्टीट्यूड वाले इलाके आमतौर पर कैसे होते हैं?
– उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आमतौर तापमान काफी ठंडा होता है. ज्यादा बारिश होती है, तेज हवाएं चलती हैं. कम वायु दबाव होता है और हवा में ऑक्सीजन का स्तर भी कम होने लगता है। 

इस ऊंचाई के लिए कई तरह के दिशा निर्देश दिए जाते हैं
1. धीरे-धीरे चढ़ो
2. एक दिन में कम ऊंचाई से सीधे 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर जाने से बचें
3. एक बार 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर सोने की ऊंचाई को प्रतिदिन 1,600 फीट (500 मीटर) से अधिक नहीं बढ़ाएं
4. प्रत्येक 3,300 फीट (1,000 मीटर) पर अनुकूलन के लिए एक अतिरिक्त दिन की योजना बनाएं.

उच्च ऊंचाई आपके शरीर को कैसे प्रभावित करती है?
– जब आप अधिक ऊंचाई पर होते हैं, तो पतली हवा के कारण आपके फेफड़ों को कम ऑक्सीजन प्राप्त होती है. यह आपके फेफड़ों और हृदय पर इसलिए ज्यादा जोर बढ़ा देता है क्योंकि आपके शरीर के बाकी हिस्सों को भी लगातार ऑक्सीजन युक्त रक्त की जरूरत होती है. जिसकी मात्रा पर अशर पड़ने लगता है. इसी वजह से बहुत अधिक ऊंचाई पर बहुत से स्वस्थ लोगों को भी चक्कर आना, सिरदर्द और थकान जैसे दिक्कतें होने लगती हैं। 

अगर कोई हृदय संबंधी दिक्कतों से गुजर रहा है तो इस ऊंचाई पर क्या अनुभव करता है?

– यदि आप किसी हृदय संबंधी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का अनुभव करते हैं तो अधिक ऊंचाई का आपके शरीर पर और भी अधिक प्रभाव पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को आमतौर पर ऊंचाई वाले स्थान पर पहुंचने के तुरंत बाद हृदय गति और रक्तचाप दोनों में बढोतरी महसूस होगी. ये समस्याएं आमतौर पर रात में और ज्यादा हो जाएंगी। 

अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी होता है क्या?
– इस बात के प्रमाण हैं कि अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं. हार्वर्ड स्कूल ऑफ ग्लोबल हेल्थ के एक अध्ययन में पाया गया कि अधिक ऊंचाई पर रहने वाले व्यक्तियों में इस्केमिक हृदय रोग से मरने की संभावना कम होती है. उनकी जीवन प्रत्याशा आमतौर पर लंबी होती है। 

क्या हृदय रोग से पीड़ित रोगी अधिक ऊंचाई पर यात्रा कर सकते हैं?
– जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में पाया गया कि उच्च रक्तचाप या हृदय रोग वाले व्यक्तियों के लिए ऊंचाई वाले स्थानों पर जाना खतरनाक हो सकता है। 
अध्ययन के अनुसार, उच्च ऊंचाई वाले स्थानों (9,840 फीट और अधिक) में कठोर शारीरिक गतिविधियों में संलग्न होने से हृदय रोग वाले लोगों के हृदय और रक्त वाहिकाओं पर बहुत अधिक तनाव पड़ सकता है, जिससे कई तरह के लक्षण हो सकते हैं। 

– सांस लेने में कठिनाई
– चक्कर आना
– छाती में दर्द
– थकान

हृदय रोगों के साथ अधिक ऊंचाई पर यात्रा करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

  • – हृदय रोग के साथ उच्च ऊंचाई पर पानी पीनाकुछ सामान्य सिफ़ारिशें हैं जिनका उच्च ऊंचाई वाले स्थानों की यात्रा करते समय हृदय रोग से पीड़ित सभी लोगों को पालन करना चाहिए:
  • – अपने उच्च ऊंचाई वाले स्थान पर चढ़ने से पहले मध्यवर्ती ऊंचाई पर एक या अधिक रातें बिताकर धीरे-धीरे उच्च ऊंचाई पर अभ्यस्त हो जाएं
  • – समुद्र तल पर आपकी आदत की तुलना में धीमी गति और कम तीव्रता से व्यायाम करें
  • – उचित रूप से हाइड्रेटेड रहें
  • – पूरी नींद लें
  • – उच्च ऊंचाई पर हृदय और रक्तचाप की दवाओं को संभावित रूप से समायोजित करने की आवश्यकता के बारे में अपने हृदय रोग विशेषज्ञ से बात करें.

बिजली बिल मामले में रेलवे को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की 10 साल पुरानी दलील; देना होगा ₹15,000 करोड़ सरचार्ज

नई दिल्ली
 सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक भारतीय रेलवे को बड़ा वित्तीय झटका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि रेलवे बिजली कानून के तहत कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं है. उसे अन्य औद्योगिक इकाइयों की तरह ही अपनी बिजली खपत पर सभी तरह के सरचार्ज देने होंगे. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने रेलवे की आठ अपीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के पुराने फैसले को सही ठहराया है. इस फैसले से राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन रेलवे के बजट पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने की आशंका है। 

रेलवे पर क्यों फूटा 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बम?
भारतीय रेलवे हर साल करीब 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करती है. इस बड़े फैसले के बाद रेलवे को बैकडेटेड एरियर यानी पुराना बकाया भी चुकाना होगा. राज्यों के हिसाब से यह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज 50 पैसे से लेकर 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है। 

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे रेलवे के ओपन एक्सेस इस्तेमाल की अवधि और क्षेत्र के हिसाब से बकाया राशि का आकलन करें. रेलवे के आंतरिक अनुमानों के अनुसार यह कुल बकाया राशि कम से कम 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम रेलवे के चालू वित्त वर्ष के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। 

10 साल पुराने कानूनी दांवपेंच में कहां मात खा गई रेलवे?

    रेलवे साल 2015 से अदालत में यह दलील दे रही थी कि वह एक ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ है. इस रणनीति के पीछे रेल मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय का साल 2014 का एक पत्र था। 

    रेलवे का दावा था कि रेलवे एक्ट 1989 की धारा 11 के तहत उसे खुद का बिजली नेटवर्क और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाने का अधिकार प्राप्त है. इसलिए वह ग्रिड से सीधे बिजली लेते समय किसी भी तरह का सरचार्ज देने के लिए उत्तरदायी नहीं है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनन डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी होने के लिए दूसरों को बिजली बेचना जरूरी है, जबकि रेलवे पूरी बिजली खुद ही कंज्यूम करती है। 

रेलवे डिस्ट्रीब्यूटर है या सिर्फ एक कंज्यूमर?
सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि रेलवे का पूरा ओवरहेड इक्विपमेंट और ट्रैक्शन सबस्टेशन उसका आंतरिक सिस्टम है. यह कोई पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम नहीं है. बिजली कानून के तहत लाइसेंसी कहलाने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। 

    पहली शर्त यह कि आपके पास डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो.
    दूसरी यह कि आप किसी तीसरे पक्ष को बिजली की सप्लाई करते हों.

रेलवे जो भी बिजली खरीदती है, उसका इस्तेमाल केवल इंजनों, सिग्नलों और स्टेशनों को चलाने में होता है. वह इसे किसी बाहरी उपभोक्ता को नहीं बेचती है. इसी आधार पर कोर्ट ने रेलवे को बिजली कानून की धारा 2(15) के तहत सिर्फ एक कंज्यूमर माना है। 

क्या अब फेल हो जाएगी रेलवे की महा-बचत योजना?
रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहम्मद जमशेद के अनुसार, इस अदालती आदेश में रेलवे की पूरी वित्तीय बचत को खत्म करने की क्षमता है. रेलवे ने साल 2015 के आसपास एक बड़ी नीतिगत पहल शुरू की थी. इसके तहत ओपन एक्सेस से सस्ती बिजली खरीदकर एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाने का लक्ष्य था. यह नया फैसला उस पूरी योजना पर पानी फेर सकता है। 

रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है. इस मिशन पर करीब 46,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने की यह मुहिम अब ओपन एक्सेस मार्केट के महंगे सरचार्ज के जाल में फंस गई है। 

पाकिस्तान के ‘इस्लामिक NATO’ के जवाब में भारत की बड़ी रणनीति, मुस्लिम देशों में बढ़ सकती है हलचल

नई दिल्ली

ईरान जंग ने मौजूदा वर्ल्‍ड ऑर्डर को उलट-पुलट कर रख दिया है. होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल और LPG लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है. मौजूदा संकट को देखते हुए अब तमाम देश एनर्जी सप्‍लाई के लिए अल्‍टरनेटिव रूट डेवलप करने की कोशिश में जुटे हैं. इसके साथ ही पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देशों के आपसी रिश्‍ते भी बदलने लगे हैं. पुराने समीकरण ध्‍वस्‍त हो रहे हैं तो नए गुट बन रहे हैं. पाकिस्‍तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर इस्‍लामिक NATO की नींव रखने का काम किया है. इन तीनों देशों का लक्ष्‍य संकट के समय एक-दूसरे का साथ देना है. हालांकि, अभी तक यह बस जुबानी जमाखर्च ही साबित हुई है. दूसरी तरफ, इस त्रिकोणीय गठजोड़ के अपने सामरिक महत्‍व भी हैं. अब भारत ने कथित इस्‍लामिक NATO का जवाब अपने अंदाज में तैयार कर लिया है. दिलचस्‍प बात यह है कि इसमें इजरायल की भी एंट्री मानी जा रही है. बता दें कि कुछ दिनों पहले ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू की UAE यात्रा की बात सामने आई थी. हालांकि, इसे खारिज कर दिया गया है. इटली के सामरिक मामलों के एक्‍सपर्ट मानते हैं कि भारत, UAE और इजरायल का गठजोड़ पश्चिम एशिया में शांति के लिए X फैक्‍टर साबित हो सकता है। 

इटली के जियोपॉलिटकल एक्‍सपर्ट सर्गियो रेस्टेली ने ‘टाइम्‍स ऑफ इजरायल’ में लिखे लेख में भारत, UAE और इजरायल के त्रिकोणीय गठजोड़ की बात कही है. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक रणनीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्गियो रेस्टेली ने The Times of Israel में प्रकाशित अपने लेख में कहा है कि भारत को संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और ईरान के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की कला विकसित करनी होगी. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को खाड़ी देशों को भरोसा दिलाते हुए ईरान के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखने चाहिए और साथ ही इजरायल के साथ सहयोग को भी मजबूत करना चाहिए. रेस्टेली के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया UAE यात्रा ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में संघर्षों ने वैश्विक शक्तियों की विदेश नीति की परीक्षा लेनी शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि भारत और यूएई के संबंध अब केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निवेश, बुनियादी ढांचा, रक्षा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक और समुद्री संपर्क जैसे क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। 

भारत के लिए यूएई और इजरायल का महत्‍व
इतालवी एक्‍सपर्ट ने यूएई को ऐसा साझेदार बताया जो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को व्यवहारिक परियोजनाओं में बदलने की क्षमता रखता है. उनके मुताबिक, अबू धाबी भारत की पश्चिम एशिया नीति का अहम स्तंभ बनता जा रहा है. रेस्टेली लिखते हैं कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता घरेलू आर्थिक मुद्दा भी है, क्योंकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी व्यवधान का असर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और घरेलू बजट पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि भारत के इजरायल के साथ रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, जल प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं. वहीं, यूएई पूंजी, भौगोलिक पहुंच और क्षेत्रीय स्वीकार्यता प्रदान करता है. रेस्टेली के अनुसार, यूएई और इजरायल मिलकर पश्चिम एशिया में एक नए व्यावहारिक ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, जो नारों की बजाय बुनियादी ढांचे, इनोवेशन और स्थिरता पर आधारित है। 

ईरान भारत के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण
सर्गियो रेस्टेली ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपनी पश्चिम एशिया नीति को किसी एक धुरी तक सीमित नहीं कर सकता. उनके मुताबिक, ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से. उन्होंने चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) को भारत-ईरान साझेदारी का सबसे ठोस उदाहरण बताया. रेस्टेली ने कहा कि ईरानी विदेश मंत्री अब्‍बास अरागची (Abbas Araghchi) की दिल्ली यात्रा ने यह संकेत दिया कि भारत तेहरान के साथ गंभीर संवाद बनाए रखना चाहता है. उनके अनुसार, संकटग्रस्त क्षेत्र में सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की क्षमता ही जिम्मेदार कूटनीति की पहचान है. लेख में कहा गया कि यूएई भारत की उभरती पश्चिम एशिया रणनीति का मुख्य आधार है, इजरायल तकनीक और रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोगी है, जबकि ईरान संपर्क और क्षेत्रीय संकट प्रबंधन के लिए आवश्यक साझेदार बना रहेगा. रेस्टेली ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अबू धाबी यात्रा ने यह स्पष्ट किया कि भारत अब केवल तेल आयातक देश के रूप में नहीं, बल्कि अपने हितों और रणनीतिक विकल्पों के साथ एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका तय कर रहा है। 

दुनिया के ‘ऑयल बैंक’ तेजी से हो रहे खाली, एक्सपर्ट्स बोले- हिल सकता है वैश्विक बाजार

 नई दिल्ली

ईरान जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से दुनिया में तेल खत्म होने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. तीन महीने पहले तक यह संभावना बेहद कम लग रही थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. होर्मुज स्ट्रेट लगभग पूरी तरह बंद रहने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की भारी कमी का खतरा बढ़ता जा रहा है। 

विश्लेषकों को अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है. इसके बजाय उनका कहना है कि युद्ध लंबे समय तक चल सकता है जिससे एनर्जी सप्लाई लंबे समय तक बाधित रह सकती है. उनके अनुसार, तेल आपूर्ति की तस्वीर बिल्कुल अच्छी नहीं दिख रही। 

डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी से 8 मई तक मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति में कुल 78.2 करोड़ बैरल की कमी आ चुकी थी और इस महीने के अंत तक यह आंकड़ा 1 अरब बैरल तक पहुंच सकता है। 

दैनिक उत्पादन के हिसाब से भी हालात गंभीर हैं. सऊदी अरब रोजाना 30 लाख बैरल से ज्यादा तेल उत्पादन गंवा रहा है. इराक का तेल उत्पादन 28.8 लाख बैरल प्रतिदिन कम हो गया है, जबकि ईरान का उत्पादन 16.9 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है. कुवैत में भी रोजाना 17.5 लाख बैरल की गिरावट दर्ज की गई है। 

तेल उत्पादन घटा, दुनिया रिजर्व रखे तेल पर चल रही
इतने बड़े स्तर पर तेल उत्पादन बंद होने के बाद दुनिया पहले से निकाले गए तेल के भंडार को इस्तेमाल कर रही है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) पहले कह चुकी थी कि दुनिया के तेल भंडार रिकॉर्ड स्तर पर हैं और इसी वजह से बाजार में भारी अतिरिक्त सप्लाई की संभावना थी. लेकिन यह अनुमान युद्ध शुरू होने से पहले का था. अब IEA चेतावनी दे रही है कि इस साल तेल की मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी। 

‘द ऑयल प्राइस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, IEA की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना करीब 39 लाख बैरल की गिरावट आ सकती है. हालांकि, यह आंकड़ा भी मध्य पूर्व में मौजूदा वास्तविक नुकसान से काफी कम है. एजेंसी का अनुमान है कि मध्य पूर्व में आपूर्ति में 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी हो चुकी है. दूसरी ओर, मांग में सिर्फ 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने का अनुमान है। 

अटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल एनर्जी सेंटर की वरिष्ठ फेलो एलेन वाल्ड ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, ‘खपत को एक सीमा तक ही कम किया जा सकता है. जब भंडार खत्म होंगे तो वे सचमुच खत्म हो जाएंगे. एक वक्त आएगा जब तेल की मांग और सप्लाई के बीच बड़ी खाई पैदा होगी और बाजार बुरी तरह हिल जाएगा. कीमतें तेजी से ऊपर जाएंगी। 

सऊदी अरामको के सीईओ ने भी दी है वॉर्निंग
यह चेतावनी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अमीन नासिर के बयान से भी मेल खाती है. उन्होंने कहा था कि दुनिया में जमीन पर मौजूद ईंधन भंडार रिकॉर्ड गति से घट रहे हैं. उनके मुताबिक, जमीन पर मौजूद तेल भंडार इस समय बाजार के लिए ‘एकमात्र सुरक्षा कवच’ हैं, लेकिन अब वे भी तेजी से कम हो रहे हैं। 

जमीन पर मौजूद तेल भंडार का मतलब उस तेल से होता है जो पहले ही जमीन से निकाल लिया गया है और बाद में इस्तेमाल के लिए बड़े टैंकरों, स्टोरेज फैसिलिटीज या रिजर्व में रखा गया हो. इस तेल को जरूरत की स्थिति, जैसे युद्ध, सप्लाई रुकना या कीमतें बढ़ना, में इस्तेमाल किया जाता है। 

जेपी मॉर्गन के कमोडिटी विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि अगले महीने तक विकसित देशों में व्यावसायिक तेल भंडार ‘ऑपरेशनल तनाव’ के स्तर तक पहुंच सकते हैं. इसका मतलब है कि तेल आपूर्ति में आई कमी को संभालना और मुश्किल हो जाएगा। 

तेल की कमी इतनी होगी कि होर्मुज खोलना ही होगा
जेपी मॉर्गन की वैश्विक कमोडिटी रणनीति प्रमुख नताशा कानेवा ने कहा, ‘हमारा निष्कर्ष है कि किसी न किसी तरह जून में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना ही होगा.’ उनके अनुसार, दुनिया तेल संकट से तभी बच सकती है जब युद्ध खत्म हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगला चरण सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रिफाइनिंग और अंतिम उपभोक्ता तक ईंधन पहुंचाने का संकट बन सकता है। 

अमीन नासिर ने यह भी कहा कि बाजार में तेल भंडार की उपलब्धता को बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है. उन्होंने बताया कि स्टोरेज में मौजूद सारा तेल वास्तव में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं होता. उसका बड़ा हिस्सा पाइपलाइन, न्यूनतम टैंक स्तर और अन्य परिचालन जरूरतों में फंसा रहता है. उन्होंने कहा, ‘यूरोप और अमेरिका में स्टोरेज से रोजाना अधिकतम 20 लाख बैरल तेल ही निकाला जा सकता है। 

केप्लर के अनुसार, फिलहाल भंडार से तेल निकासी सीमित स्तर पर है. मार्च के आखिर से अब तक जमीन पर मौजूद भंडार से करीब 6 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है. इसके बावजूद अभी करीब 3 अरब बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, हालांकि उसमें से कितना वास्तव में उपलब्ध है, यह साफ नहीं है। 

कमजोर होता दुनिया का सुरक्षा कवच
विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो भंडार तेजी से घटेंगे और उन्हें दोबारा भरने के लिए पर्याप्त नई सप्लाई उपलब्ध नहीं होगी. यानी युद्ध जितना लंबा चलेगा, दुनिया का सुरक्षा कवच उतना कमजोर होता जाएगा। 

हालांकि, कुछ राहत की खबर भी है. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, बाजार अब इस स्थिति का आदी होने लगा है. भंडार से तेल निकालने की वजह से तत्काल घबराहट कम हुई है और अब बाजार कमी को मैनेज करना सीख रहा है जिसका मतलब है कि तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। 

कैपिटल इकोनॉमिक्स के कमोडिटी अर्थशास्त्री हमाद हुसैन ने कहा, ‘तेल कार्गो की तत्काल खरीद की होड़ अब कम हो गई है. लेकिन हम तेजी से भंडार खाली कर रहे हैं और इसका सीधा असर कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा। 

चिकन नेक इलाके की जमीन केंद्र को सौंपने पर मुहर, शुभेंदु सरकार का बड़ा फैसला

कोलकाता
पश्चिम बंगाल सरकार ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकेन नेक) से जुड़े राष्ट्रीय राजमार्ग खंडों को केंद्रीय एजेंसियों को सौंपने की मंजूरी दे दी है, जिससे करीब एक साल से लंबित प्रक्रिया पूरी हो गई. 7 राष्ट्रीय राजमार्ग खंड अब केंद्र के अधीन होंगे। 

ये हाईवे पहले राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधीन थे, लेकिन अब इन्हें भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHIDCL) संभालेंगे. करीब एक साल तक प्रस्ताव लंबित रहने की वजह से इन मार्गों पर विकास और निर्माण कार्य ठप पड़े थे। 

चिकन नेक कॉरिडोर
बता दें, चिकन नेक कॉरिडोर जिसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी कहा जाता है, भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक भूभाग है. यह देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। 

यह एक एक संकरा भूभाग है. पश्चिम बंगाल में स्थित इस कॉरिडोर की चौड़ाई कुछ जगहों पर महज 22 किलोमीटर है. यह कॉरिडोर रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से काफी अहम है। 

चिकन नेक कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी जिलों के बीच स्थित एक अहम क्षेत्र है. यह उत्तर में नेपाल और भूटान, जबकि दक्षिण में बांग्लादेश से घिरा हुआ है. भारत की सुरक्षा और संपर्क व्यवस्था के लिहाज से यह कॉरिडोर काफी अहमियत रखता है। 

वहीं, इस बीच बंगाल सरकार ने वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों से संबंधित जांच में आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के पूर्व प्रिंसिपल के खिलाफ केस चलाने की मंजूरी भी दी है। 

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 9 अगस्त 2024 को आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में हुई क्रूर हत्या और बलात्कार के मामले में, ईडी को तत्कालीन आरजीकर अधीक्षक संदीप घोष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की अनुमति मिल गई है। 

शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इस मामले की जांच प्रक्रिया को लंबे समय तक जबरन और अनैतिक रूप से रोके रखा। 

उन्होंने आगे कहा कि, हमारा मानना ​​है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है. सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता. मैं चाहता हूं कि असली दोषियों की जल्द से जल्द पहचान हो, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले, बंगाल की जनता को न्याय मिले। 

कोलकाता के राधागोविंद कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 9 अगस्त 2024 की रात 31 साल की महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या का मामला सामने आया था. ट्रेनी डॉक्टर का शव अस्पताल के सेमिनार हॉल से बरामद हुआ था. इसके बाद इस मामले में कोलकाता पुलिस ने मुख्य आरोपी सिविल वॉलंटियर संजय रॉय को गिरफ्तार किया। 

अस्पताल परिसर में हुई इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया. घटना के विरोध में पश्चिम बंगाल समेत देशभर में डॉक्टरों ने प्रदर्शन और हड़ताल देखने को मिली। 

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोलकाता हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए. जांच के बाद सीबीआई ने गैंगरेप के आरोपों से इनकार किया. मामले में संजय रॉय को दोषी पाया गया. इसके बाद जनवरी 2025 में अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। 

ममता सरकार में साइडलाइन रहीं दमयंती सेन की वापसी, शुभेंदु सरकार ने दी बड़ी जिम्मेदारी

कलकत्ता

सीनियर आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन की पश्चिम बंगाल की कानून व्यवस्था में वापसी हो गई है. उन्होंने साल 2012 के पार्क स्ट्रीट गैंगरेप केस की जांच से खूब सुर्खियां बटोरी थीं. लेकिन तत्कालीन TMC सरकार में नो हाशिए पर धकेल दी गई थीं। 

दमयंती सेन को शुभेंदु सरकार ने एक विशेष आयोग में नियुक्त किया है. ये आयोग महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की जांच के लिए बनाया है.  श्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद इस नियुक्ति का ऐलान किया। 

सीएम शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि आईपीएस दमयंती सेन को उस जांच आयोग का ‘मेंबर सेक्रेटरी’ नियुक्त किया गया है, जो टीएमसी के 15 साल के शासनकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हुए अत्याचारों की जांच करेगा. ये आयोग अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और बच्चों के साथ हुए अपराधों की जांच करेगा। 

कौन हैं आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन?
बता दें कि साल 1996 बैच की आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन कोलकाता पुलिस की पहली महिला ज्वाइंट कमिश्नर (क्राइम) थीं. 6 फरवरी 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट इलाके में एक नाइट क्लब से निकली महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार हुआ था. तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना को उनकी नई सरकार को बदनाम करने के लिए रचा गया एक ‘सजायनो घटना’ (मनगढ़ंत कहानी) करार दिया था। 

सच का साथ देने पर हुआ था तबादला
दमयंती सेन के नेतृत्व में पुलिस टीम ने जांच की और कुछ ही दिनों में आरोपियों को दबोच लिया. पुलिस जांच ने साबित कर दिया कि बलात्कार की घटना सच थी, जो सरकार के राजनीतिक दावों के बिल्कुल उलट था. केस सुलझने के तुरंत बाद ही दमयंती सेन का तबादला लालबाजार क्राइम ब्रांच से बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज कर दिया गया था। 

सरकार ने इसे रूटीन ट्रांसफर बताया था, लेकिन विपक्ष और आलोचकों का मानना था कि सरकार के रुख के खिलाफ जाकर सच सामने लाने की वजह से उन्हें सजा दी गई. इसके बाद टीएमसी के पूरे कार्यकाल में उन्हें किसी बड़े की जिम्मेदारी नहीं दी गई। 

हाईकोर्ट ने जताया था भरोसा
प्रशासनिक हलकों में दमयंती सेन की
ईमानदारी हमेशा चर्चा में रही. साल 2022 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने न्यायपालिका का भरोसा जताते हुए उन्हें राज्य के चार बलात्कार मामलों और चर्चित रसिका जैन मौत मामले की जांच सौंपी थी. इसके बाद 2023 में उन्हें एडीजी (ट्रेनिंग) बनाया गया था। 

पुतिन का फिर भारत दौरा तय, सितंबर में BRICS सम्मेलन में होंगे शामिल

 नई दिल्ली

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे। यह सम्मेलन 12-13 सितंबर को आयोजित होगा। क्रेमलिन ने इसकी पुष्टि कर दी है। एक साल के भीतर पुतिन का यह दूसरा भारत दौरा होगा। इससे पहले रूसी राष्ट्रपति पिछले साल दिसंबर में 23वें भारत-रूस एनुअल समिट में हिस्सा लेने के लिए यहां आए थे। बता दें कि इस महीने की शुरुआत में, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत में थे। ब्रिक्स नेताओं की बैठक पिछले साल जुलाई में ब्राजील के रियो डि जनेरियो में हुई थी। यह ब्रिक्स का 17वां शिखर सम्मेलन था, जिसका विषय था-‘अधिक समावेशी और सतत शासन के लिए वैश्विक दक्षिण सहयोग को सशक्त बनाना।’

भारत के लिए रूस अहम क्यों
भारत का रूस संबंध विदेश नीति के लिए काफी अहम है। खासतौर पर पिछले कई दशकों से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और ऊर्जा संबंध काफी करीबी रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ अरसे में भारत, अमेरिका के नजदीक आया है। इसके बावजूद, भारत अभी भी रूस को अपनी दीर्घकालीन रणनीतिक हितों की सुरक्षा में अहम सहयोगी मानता है।

भारत के लिए रूस इसलिए भी अहम है क्योंकि, देश के डिफेंस स्ट्रक्चर में यह एक बड़ी भूमिका निभाता है। भारतीय सशस्त्र बलों के सैन्य हार्डवेयर का एक बड़ा हिस्सा रूसी मूल का है। इसमें एस-400 ट्रायंफ एयर डिफेंस सिस्टम, सुखोई लड़ाकू विमान और संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस मिसाइल शामिल हैं। दशकों में, मॉस्को भारत का सबसे भरोसेमंद सप्लायर बनकर उभरा है जो उन्नत सैन्य उपकरण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और रणनीतिक रक्षा सहयोग प्रदान करता है।

तेल संकट में भी बड़ा मददगार
एक जो सबसे अहम बात है, वह यह है कि मौजूदा हालात को देखते हुए रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी तेजी से महत्वपूर्ण हो गया है। यूक्रेन संघर्ष के बाद मॉस्को पर पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते, भारत ने रियायती रूसी कच्चे तेल का आयात तेजी से बढ़ा दिया। इस कदम ने नई दिल्ली को वैश्विक ऊर्जा मूल्य झटकों से बचाने, घरेलू ईंधन की कीमतों को स्थिर करने और आर्थिक अनिश्चितता के समय मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद की।

चीन के खिलाफ भी आएगा काम
रक्षा और ऊर्जा के अलावा, इस संबंध का जियो-पॉलिटिकल महत्व भी काफी है। रूस के साथ भारत की घनिष्ठ भागीदारी तेजी से ध्रुवीकृत हो रहे वैश्विक क्रम में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। मॉस्को के साथ मजबूत संबंध बनाए रखकर, नई दिल्ली यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि रूस की चीन के साथ बढ़ती साझेदारी सीधे भारतीय हितों के खिलाफ एक गठबंधन में न बदल जाए। रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई संवेदनशील मुद्दों पर लगातार भारत का समर्थन भी किया है, जिससे नई दिल्ली को वीटो रखने वाली वैश्विक शक्ति का समर्थन मिलता है।

ब्रिक्स क्या है
ब्रिक्स एक प्रभावशाली
संगठन है, जिसे मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर बनाया था। इसका मकसद पश्चिमी देशों के पारंपरिक भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देना था। यह संगठन विश्व की जनसंख्या और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का एक विशाल हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है। इसका ध्यान अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों में सुधार करने और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है।

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